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अयोध्या दर्शन 



Ayodhya With little over 10 sq Km in area, lying on the banks of the river Ghagra or Saryu, this ancient city is believed to be the birth place of Lord Rama, the seventh incarnation of Lord Vishnu. The holy book of Hindus- the Ramayana- says, the city was founded by Manu. Later, it became the capital of the descendants of the Surya dynasty. Lord Rama was the most celebrated King of this dynasty. Known as ‘Kosaldesa’ in ancient times, the place has been described as “a city built by gods and being as prosperous as paradise itself”, in the Atharvaveda. From the time immemorial, this place has been noted for the performance of various rituals and Yajnas, including ‘Asvamedha Yajna’. From the epic and puranic ages, Ayodhya rose to prominence again in the 6th century B.C,the times of Buddha. Situated just about 10 Km from the district headquarters of Faizabad, Ayodhya is a city of temples of several religions. Various faiths have grown and prospered simultaneously and that also in different periods of time in the history. Jain traditions, for example, consider that five Tirthankaras were born at Ayodhya including Rishabhadeva, the first Tirthankar. Don’t miss the remnants of Buddhism, Hinduism, Islam and Jainism, that can still be found in Ayodhya.

Ayodhya is preeminently a city of temples yet, all places of worship here, are not only of Hindu religion. At Ayodhya several religions have grown and prospered simultaneously and also at different periods of time in the past.

Places to visit

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THE FAMOUS HANUMAN GARHI TEMPLE
HANUMAN GARHI

This is the most famous Temple of Ayodhya. It is 2 KM Far from the the Railway Station. Situated in the center of the town, this temple is approachable by a flight of 76 steps. Legend has it that Hanuman lived here in a cave and guarded the Janambhoomi or Ramkot. The main temple contains the statue of Maa Anjani, with Bal Hanuman seated on her lap. The faithful believe that all their wishes are granted with a visit to this holy shrine. Around this temple there is a huge amount of shopkeepers selling flowers and sweets.
A massive structure in the shape of a four sided fort with circular bastions at each corner houses a temple of Hanuman and is the most popular shrine in Ayodhya.



Kanak Bhawan
This has images of Sri Rama and Sita wearing gold crowns. It is also known as Sone-ke-Ghar.According to mythology in ancient time it a palace of gold. This palace was given to Sita by Kakai.




Ramkot


The chief place of worship in Ayodhya is the site of the ancient citadel of Ramkot which stands on an elevated ground in the western part of the city. Although visited by pilgrims throughout the year, this sacred place attracts devotees from all over India and abroad, on `Ram Navami’, the day of Lord’s birth, which is celebrated with great pomp and show, in the Hindu month of Chaitra (March-April).




Nageshwarnath Temple
The temple of Nageshwarnath is said to have been established by Kush the son of Rama. Legend has it that Kush lost his armlet, while bathing in the Saryu, which was picked up by a Nag-Kanya, who fell in love with him. As she was a devotee of Shiva, Kush erected this temple for her. It is said that this has been the only temple to have survived till the time of Vikramaditya, the rest of city had fallen into ruins and was covered by dense forests. It was by means of this temple that Vikramaditya was able to locate Ayodhya and the sites of different shrines here. The festival of Shivratri is celebrated here with great pomp and splendor.
Tulsi Udyan

Tulsi udyan is a beutiful garden created by the government. it is few far away from the Naya Ghat which is also created by government

Saryu River

Ayodhya Darshan starts only after the Saryu Snan
without saryu snan it is meant uncomplete.









Other places of interest
Rishabhadeo Jain Temple, Brahma Kund, Amawan Temple, Tulsi Chaura, Laxman Quila, Angad Tila, Shri Rama Janaki Birla Temple, Tulsi Smarak Bhawan, Ram ki Paidi, Kaleramji ka Mandir, Datuvan Kund, Janki Mahal, Gurudwara Brahma Kund Ji, Ram Katha Museum, Valmiki Ramayan Bhawan, are among other places of interest in Ayodhya.

Language : Hindi, Avadhi and English
Festivals : Shravan Jhoola Mela (July-August), Parikrama Mela (October-November), Ram Navmi (March-April), Rathyatra (June-July), Saryu Snan (October-November), Ram Vivah (November), Ramayan Mela.
Local Transport : Taxis/Tongas/Tempos/Buses/Cycle-Rikshaws.

RTI मलतब है सूचना का अधिकार - ये कानून हमारे देश में 2005 में लागू हुआ। जिसका उपयोग करके आप सरकार और
किसी भी विभाग से सूचना मांग सकते है। आमतौर पर लोगो को इतना ही पता होता है।परंतु आज मैं आप को इस के बारे में कुछ और रोचक जानकारी देता हूँ -
RTI से आप सरकार से कोई भी सवाल पूछकर सूचना ले सकते है।
RTI से आप सरकार के किसी भी दस्तावेज़ की जांच कर सकते है।
RTI से आप दस्तावेज़ की प्रमाणित कापी ले सकते है।
RTI से आप सरकारी कामकाज में इस्तेमाल सामग्री का नमूना ले सकते है।
RTI से आप किसी भी कामकाज का निरीक्षण कर सकते हैं।
RTI में कौन- कौन सी धारा हमारे काम की है।

धारा 6 (1) - RTI का आवेदन लिखने का धारा है।
धारा 6 (3) - अगर आपका आवेदन गलत विभाग में चला गया है। तो वह विभाग
इस को 6 (3) धारा के अंतर्गत सही विभाग मे 5 दिन के अंदर भेज देगा।
धारा 7(5) - इस धारा के अनुसार BPL कार्ड वालों को कोई आरटीआई शुल्क नही देना होता।
धारा 7 (6) - इस धारा के अनुसार अगर आरटीआई का जवाब 30 दिन में नहीं आता है
तो सूचना निशुल्क में दी जाएगी।
धारा 18 - अगर कोई अधिकारी जवाब नही देता तो उसकी शिकायत सूचना अधिकारी को दी जाए।
धारा 8 - इस के अनुसार वो सूचना RTI में नहीं दी जाएगी जो देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा हो या विभाग की आंतरिक जांच को प्रभावित करती हो।
धारा 19 (1) - अगर आप
की RTI का जवाब 30 दिन में नहीं आता है। तो इस
धारा के अनुसार आप प्रथम अपील अधिकारी को प्रथम अपील कर सकते हो।
धारा 19 (3) - अगर आपकी प्रथम अपील का भी जवाब नही आता है तो आप इस धारा की मदद से 90 दिन के अंदर दूसरी
अपील अधिकारी को अपील कर सकते हो।
RTIकैसे लिखे?
इसके लिए आप एक सादा पेपर लें और उसमे 1 इंच की कोने से जगह छोड़े और नीचे दिए गए प्रारूप में अपने RTI लिख लें
..............................
.....
सूचना का अधिकार 2005 की धारा 6(1) और 6(3) के अंतर्गत आवेदन।
सेवा में,
अधिकारी का पद / जनसूचना अधिकारी
विभाग का नाम.............
विषय - RTI Act 2005 के अंतर्गत .................. से संबधित सूचनाऐं।
अपने सवाल यहाँ लिखें।
1-..............................
2-...............................
3-..............................
4-..............................
मैं आवेदन फीस के रूप में 20रू का पोस्टल ऑर्डर ........ संख्या अलग से जमा कर रहा /रही हूं।
या
मैं बी.पी.एल. कार्डधारी हूं। इसलिए सभी देय शुल्कों से मुक्त हूं। मेरा बी.पी.एल.कार्ड नं..............है।
यदि मांगी गई सूचना आपके विभाग/कार्यालय से सम्बंधित
नहीं हो तो सूचना का अधिकार अधिनियम,2005 की धारा 6 (3) का संज्ञान लेते हुए मेरा आवेदन सम्बंधित लोकसूचना अधिकारी को पांच दिनों के
समयावधि के अन्तर्गत हस्तान्तरित करें। साथ ही अधिनियम के प्रावधानों के तहत
सूचना उपलब्ध् कराते समय प्रथम अपील अधिकारी का नाम व पता अवश्य बतायें।
भवदीय
नाम:....................
पता:.....................
फोन नं:..................
हस्ताक्षर...................
ये सब लिखने के बाद अपने हस्ताक्षर कर दें।
अब मित्रो केंद्र से सूचना मांगने के लिए आप 20 रु देते है और एक पेपर की कॉपी मांगने के 2 रु देते है।
हर राज्य का RTI शुल्क अगल अलग है जिस का पता आप कर सकते हैं।
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 लेखक 
अज्ञात 
 
साभार 
प्रियांकु भटनागर
 
पतित पावनी गंगा को देव नदी कहा जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार गंगा स्वर्ग से धरती पर आई है। मान्यता है कि गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली है और भगवान शिव की जटाओं में आकर बसी है।
श्री हरि और भगवान शिव से घनिष्ठ संबंध होने पर गंगा को पतित पाविनी कहा जाता है। मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है।
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एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली," प्रभु ! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी?"
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इस पर श्री हरि बोले,"गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आ कर आप में स्नान करेंगे तो आप के सभी पाप घुल जाएंगे।"
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गंगा नदी इतनी पवित्र है की प्रत्येक हिंदू की अंतिम
इच्छा होती है उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही
किया जाए लेकिन यह अस्थियां जाती कहां हैं?
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इसका उत्तर तो वैज्ञानिक भी नहीं दे पाए क्योंकि असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगा जल पवित्र एवं पावन है। गंगा सागर तक खोज करने के बाद भी इस प्रश्न का पार नहीं पाया जा सका।
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सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थि को गंगा में विसर्जन करना उत्तम माना गया है। यह अस्थियां सीधे श्री हरि के चरणों में बैकुण्ठ जाती हैं।
जिस व्यक्ति का अंत समय गंगा के समीप आता है उसे
मरणोपरांत मुक्ति मिलती है। इन बातों से गंगा के प्रति हिन्दूओं की आस्था तो स्वभाविक है।
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वैज्ञानिक दृष्टि से गंगा जल में पारा अर्थात (मर्करी)
विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में कैल्शियम और
फोस्फोरस पानी में घुल जाता है। जो जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है। वैज्ञानिक दृष्टि से हड्डियों में गंधक (सल्फर) विद्यमान होता है जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण होता है। इसके साथ-साथ यह दोनों मिलकर मरकरी सल्फाइड साल्ट का निर्माण करते हैं। हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम, पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है। धार्मिक दृष्टि से पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंततःशिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते हैं।


हर हर गंगे



लेखक 
अज्ञात

साभार 
प्रियांकु भटनागर 
लेख भेजने के लिए
 मान लीजिये कि कोई ऐसा नीरस शुष्क एवं केवल भौतिकवादी बुद्धिजीची है कि जो न तो भगवान को मानता है और न ही कृतज्ञता को मानता है। यह संसार को केवल एक लेन-देन की मण्डी मानता है। यह मानता है कि बिना लिये दिये यहां का कार्य नहीं चलता। मात्र लेन-देन ही संसार का आधार है। ठीक है,  कोई कुछ भी मानने में स्वतंत्र है जिसका जैसा जी चाहे मानें। परन्तु विज्ञान को तो मानना ही पडेगा। चाहे आस्तिक हो या नास्तिक दोनों ही इसे स्वीकार करते हैं। अपितु नास्तिक इसे अधिकार स्वीकार करता है। वह यह मानता है कि संसार परमाणुओं के मिलने से हुआ है। परमाणुणों के मिलन का नाम रचना है और बिखरन का नाम विनाश है। सब ग्रह उपग्रह परस्पर आकर्षण में बंधे हुए नियम से कार्य कर रहे है। ‘बिग बैंग’ से परमाणुओं में गति उत्पन्न हुई और उनके मेल से धीरे-2 पदार्थों का निर्माण होता चला गया। ठीक है! हम थोडी देर के लिए उनके इस विचार से सहमति रखते हैं। परन्तु विज्ञान को विज्ञान की ही दृष्टि से देखना चाहिए, मूर्खता की दृष्टि से नही। ऐसा नहीं है कि विज्ञान में सब कार्य चमत्कारी ढंग से पूर्ण होते हैं। स्मरण रखिये कि विज्ञान में एक क्रमबद्धता (वतकमत) होती है और सब कार्य एक निश्चित क्रम में एक नियम के अनुसर करते है। यदि रत्ती भर भी उस नियम का भंग होगा तो कार्य कभी सम्पन्न नहीं हो सकेगा। संसार के सभी भौतिकवादी इसे एक मत से स्वीकार करते हैं। विज्ञान कि जितने भी कार्य आपको दिखाई देते हैं वे सभी इसी नियमबद्धता पर आधारित हैं। अब विचार करना चाहिये कि क्या नियम कभी बिना नियामक के बन सकता है?  क्या नियम स्वयं बन जाते हैं? सड़क पर बाई ओर लोग अपने आप चलने लग गये या किसी ने ऐसा करने के लिए कहा? बाजार में अधिक वाहनों आदि के होने से भीड़ होने पर लाल बत्ती होने पर रूकने एवं हरी होनें पर चलने का नियम स्वयं बन गया था या किसी ने बनाया? नियम कभी भी बिना नियामक की यह विशेषता है कि वह कहीं भी, कुछ भी अपने नियमों को नहीं बदलता, चाहे इसके लिए उसे कितनी भी कठिनाई का सामना क्यों न करना पडे। इसलिए यदि आप विज्ञानवादी हैं और यह  मानते हैं कि नियम बनाने वाला कोई नहीं तो इस बात को अपने मन से निकाल दीजिसे कि नियम स्वयं बनते हैं। अरे! जब सड़क पर चलने का साधारण सा नियम भी स्वयं नहीं बनता तो पदार्थों के निर्माण का महान कार्य क्या कभी बिना कर्ता के हो सकता है?
    दर्शन एवं विज्ञान दोनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। वैशेषिक दर्शन का ऋषि कहता है - ‘कारण अभावात् कार्य अभावः।’ अर्थात् कारण नहीं होगा तो कार्य नहीं होगा। यह एक सर्वतन्त्र सिद्धांत है। न्दपअमतेंस ज्तनजी है जो कहीं भी, कभी भी कुछ भी नहीं बदलती। जैसे पृथ्वी घुमती है इसे सब स्वीकार करते हैं। वैसे यह भी सिद्धांत है कि बिना कारण के कार्य नहीं होता। अब कारण कितने हैं? भारतीय वैज्ञानिकों, अपितु वैदिक विद्वानो ने इसे तीन भागों में विभक्त किया है। उपादान करण वह कि जिससे वस्तु बनती है जैसे कि घड़ा मिट्टी से मेज लकडी से और तलवार लोहे से बनती है। जब तक मिट्टी लकडी एवं लोहा नहीं होगा तब तक घडा मेज व तलवार नहीं बन सकते। दूसरा है साधारण कारण वह कि बनाने के साधन, घडा बनाने के लिये चाक, दण्ड, पानी एवं समय की मेज बनाने के लिए कुल्हाडी रन्दा, कीलें आदि की और तलवार बनाने के लिए भट्ठी, हथौड़ा, अग्नि आदि की आवश्यकता है। समय तो सामूहिक रूप से सबमें लगता ही है। अब मिट्टी है, चाक है, दण्ड है, पानी है और कुल्हाडी रन्दा, कीले, भट्ठी हथौडा अग्नि आदि सभी कुछ है, परन्तु बनाने वाला कुम्हार, बढ़ई और लौहार नहीं है तो क्या ये सब वस्तुऐं अपने आप बन जायेंगी? कदापि नहीं, यही तीसरा कारण कारण निमित्त कारण कहलाता है।  ये वे तीन परम आवश्यक साधन हैं जिनके बिना कभी कोई पदार्थ या रचना संभव ही नहीं है। अतः इस स्थिति में नास्तिक लोगों का यह कहना ठीक नहीं है कि संसार मात्र परमाणुओं के मेल से स्वयं बन गया।नहीं-2 उपादान कारण प्रकृति साधारण कारण-समय आदि और निमित्त कारण स्वयं ईश्वर के बिना सृष्टि रचना की कल्पना ही व्यर्थ है। यहां एक शंका यह हो सकती है कि जैसे कुम्हार को घड़ा बनाने के लिए चाक, दण्ड पानी आदि की आवश्यकता है तो क्या ईश्वर को भी इस प्रकार के बाहरी साधनों की आवश्यकता थी
 जी नहीं! ईश्वर का कार्य बाहरी रूप से पदार्थों का निर्माण करने का नहीं है। बाहरी साधनों की आवश्यकता अल्प शक्ति वालों एवं स्थूल शरीर वालों को रहती है। सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, एवं परम सूक्ष्म ईश्वर को नहीं। वह तो परमाणुओं के भीतर भी व्यापक है और बाहर भी अतः उसे कार्य करने के लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता ही नहीं है। वह अन्दर से अपना कार्य करता है। स्मरण रखिये ईश्वर का कार्य घड़ा, मेज या तलवार बनाना नहीं है अपितु मिट्टो, लकड़ी या लोहा (वह भी सूक्ष्म अवस्था में) बनाना है जो मनुष्य नहीं बना सकता।
    अब यदि आर्प इैश्वर को नहीं मानते तो विज्ञान का सारा दुर्ग एक फूक में उड जायेगा। अतः यह कहना कि पराणुओं में गति आने से सब पदार्थों का निर्माण स्वतः ही हो गया मूखर्ता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। वेद मंत्र स्वयं कहा है- हिरण्यगर्भः समवर्तमाग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। संसार की उत्पत्ति से पूर्व प्रकृति भी थी और उसको गति देने वाला उसका स्वामी ईश्वर भी था। अतः यदि ईश्वर को न मानें तो यह महान् समस्या उत्पन्न हो जायेगी कि कोई भी पदार्थ बन नहीं सकेगा।
3    ज्ञान का अभाव: तीसरी महान् हानि होगी प्राणियों में और विशेष रूप से मनुष्यों में ज्ञान का अभाव होगा। ज्ञान दो प्रकार का है एक स्वाभाविक, दूसरा नैमितिक। स्वाभाविक ज्ञान जो पशुओं आदि है, इसमें कोई बहुत अधिक परिवर्धन नहीं किया जा सकता। हां! सामान्य रूप से उसका उपयोग हम अपने अनुसार करने योग्य उन्हें मोड़ लेते हैं परन्तु मनुष्यों का ज्ञान इससे भिन्न है। यह बढ़ाने से बढ़ जाता है और घटाने से घट जाता है। यदि सृष्टि के आरंभ में, ईश्वर मनुष्य को ज्ञान (वेद) न देता तो यह कभी भी ज्ञानवान नहीं बन सकता था। जो लोग (विशेष रूप से विकासवादी) यह कहते हैं कि मनुष्य में ज्ञान का उदय धीरे-2 हुआ, आरंभ में वह निरा जंगली ही था अपितु पशु ही था, वे बहुत बडी भूल में पडे हैं। उदाहरण के रूप में हमपने अपने शिक्षकों से, ुगुरूओं से शिक्षा पाई, उन्होंने अपने गुरूओं से और उन्होंने अपने गुरूओं से। यह क्रम पीछे की और चलते-2 एक ऐसी अवस्था में चला जाता है जहां पर शिक्षा देने वाला कोई भी गुरू नहीं बचता। उस समस्या का समाधान संसार का महानतम आस्तिक ऋषि, पंतजलि करता है। वह कहता है ‘ स पूर्वेषामापि गुरू कालेनानवच्छेदात् (योग 1/26) वह गुरूओं का भी गुरू है जिसको काल भी बाधित नहीं कर सकता। विकासवादी कहता है कि मनुष्य का विकास बन्दर से हुआ और धीरे-2 उसके ज्ञान में वृद्धि हुई। प्रथम तो इस विचार में ही अनेकों भ्रांतियां हैं फिर भी यदि यह मान लिया जाये कि मनुष्य का विकास बन्दरों से हुआ तो फिर ज्ञान का उदय होना, वह भी उतनी उच्च कोटि का यह नितांत असंभव है। बाहर की परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों नहो, उससे केवल इतना तो प्रभाव पड़ सकता है कि उससे प्राणियों का ब्राहृ रंग रूप कुछ बदल जाये या उनका खान पान बदल जाये परन्तु यह संभव नहीं है कि उनमें अमूल चूल परिवर्तन इस सीमा तक हो जाये कि जिससे उनकी समूची जाति ही बदल जाये और वह अपना विकास इस सीमा तक कर ले कि ज्ञान का उदय उसे धरा से गगन तक बढ़ा दे। बन्दरों का स्वभाव तो क्रूर, लड़ने झगड़ने एवं छीना झपटी का है। मनुष्य में यह संवेदना, एक दूसरे से सहायोग की भावना कहां से आ गई? ज्ञान भी ईश्वर प्रदत्त है। यदि ईश्वर को न मानें तो फिर आदि में ज्ञान का अभाव होने से मनुष्य अज्ञानी ही रहेगा।

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जब उत्तर भारत ख़िलजी, तुग़लक़, ग़ोरी, सैयद, बहमनी और लोदी वंश के विदेशी मुसलमानों के हाथों रौंदा जा रहा था तब भी दक्षिण भारत के "विजयनगर साम्राज्य" (1336-1665) ने 300 से अधिक वर्षों तक दक्षिण मे हिन्दू अधिपत्य कायम रखा ! इसी विजयनगर साम्राज्य के महाप्रतापी राजा थे "कृष्णदेव राय" ।

बाबरनामा, तुज़के बाबरी सहित फ़रिश्ता, फ़ारस के यात्री अब्दुर्रज्जाक ने "विजयनगर साम्राज्य" को भारत का सबसे वैभवशाली, शक्तिशाली और संपन्न राज्य बताया है, जहां हिन्दू-बौद्ध-जैन धर्मामलंबी बर्बर मुस्लिम आक्रान्ताओं से खुद को सुरक्षित पाते थे । जिनके दरबार के 'अष्ट दिग्गज' में से एक थे महाकवि "तेनालीराम", जिनकी तेलगू भाषा की कहानियों को हिन्दी-उर्दू मे रूपांतरित कर "अकबर-बीरबल" की झूठी कहानी बनाई गयी ।

इसी शक्तिशाली साम्राज्य मे एक "सेक्युलर राजा रामराय" का उदय हुआ, जिस "शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य" पर 300 साल तक विदेशी आक्रांता गिद्ध आंख उठा कर देखने की हिम्मत नही कर सके थे, उसे एक सेक्युलर सोच ने पल भर मे खंडहर मे तब्दील कर दिया ।

राजा कृष्णदेव राय की 1529 मे मृत्यु के 12 साल बाद "राम राय" विजयनगर" के राजा बने । रामराय पडले दर्जे के सेक्युलरवादी थे, सर्वधर्मसमभाव और हिन्दू-मुस्लिम एकता मे विश्वास रखने वाले रामराय ने दो गरीब अनाथ बेसहारा मुस्लिम भाइयों को गोद लिया । इन दोनो मुस्लिम भाइयों को न सिर्फ अपने बेटे का दर्जा दिया बल्कि उनके लिये महल प्रांगण मे ही मस्जिद बनबा कर दिया ।

ऐसे राजा रामराय के शासनकाल मे "विजयनगर साम्राज्य" की सैन्य शक्ति मे कोई कमी नही आई थी, कहा जाता है उनकी सेना मे 2 लाख सिपाही थे । अकेले विजयनगर से जीत पाने मे असमर्थ मुस्लिम आक्रान्ताओं ने 1567 में "जिहाद" का नारा देकर एक साथ आक्रमण किया ।

जिहाद के नारे के साथ 4 मुसलिम राज्यों ( अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा और बीदर ) ने एक साथ विजयनगर पर हमला किया, इस युद्ध को राक्षस-टंग़ड़ी' या "तालीकोटा का युद्ध" कहा जाता है । 4 मुस्लिम राज्यों के सम्मिलित आक्रमण के बावजूद विजयनगर युद्ध जीत चुका था पर एन मौके पर राजा रामराय के गोद लिये दोनो लड़कों ने रामराय पर पीछे से वार कर दिया और कत्ल कर दिया ।

रामराय के गोद लिये बेटों के हाथों मारे जाते ही मुस्लिम सेनयों ने भयंकर मार-काट मचा दिया, लगातार 3 दिनों तक विजयनगर के स्त्री-पुरुष-बच्चे बेदर्दी से कत्ल किये गये, जिसकी सांख्या 1 लाख से ज्यादा बताई जाती है, विजयनगर को आग लगाकर नष्ट कर दिया गया । इस प्रकार एक सेक्युलर सोच ने समृद्ध-सक्षम हिन्दू साम्राज्य का अंत कर दिया ! इसी महान साम्राज्य के खंडहरों पर खड़ा है आज का शहर "हम्पी", जिसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर विरासत के रूप मे दर्ज किया है ।

इतिहास गवाह है --अपने माता-पिता सहित पूर्वजों के माथे के कलंक ये सेक्युलर प्राणी जन्म ही कुल-खानदान, स्वधर्म, मातृभूमि का नाश करने के लिये लेते हैं
क्या ये सत्य है:-
राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो एक बार रोते-रोते अमेरिका पहुँच गये ! एक तो हमारे देश मे भिखारियों की बहुत बड़ी समस्या है ! देश का प्रधानमंत्री भी भिख मंग्गे की तरह ही बात करता है!

कटोरा लेकर राजीव गांधी पहुँच गये अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के पास! और कहने लगे हमे सुपर कम्पुटर दे दो ! इस देश के वैज्ञानिको ने बहुत समझाया था की मत जाइए बेइज्जती हो जाएगी लेकिन नहीं माने क्योंकि उनको धुन स्वार थी की हिंदुस्तान को 21 वीं सदी मे लेकर जाना है जैसे राजीव गांधी के चाहने पर ही देश 21 वीं सदी मे जाएगा अपने आप नहीं जाएगा ! तो रोनाल्ड रीगन ने कहा हमने सोचा है ना तो हम आपको सुपर कम्पुटर देंगे और न ही क्रायोजेनिक इंजन देंगे ! जबकि अमेरिका की कंपनी IBM के मन मे था की भारत सरकार से कुछ समझोता हो जाए और उसका सुपर कम्पुटर भारत मे बिक जाए ! लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने साफ माना कर दिया की ये संभव नहीं है ! ना तो बनाने के technology देंगे और ना ही बना बनाया सुपर कम्पुटर देंगे !! तो बेचारे मुह लटकाये राजीव गांधी भारत वापिस लौट आए और जो वाशिंगटन मे बेइज्जती हुई वो अलग !!
कांग्रेस वर्षों से देशवासियों को गलत तथ्यों से अवगत कराती आई है और देशवासी बिना किसी मौलिक जानकारी के अभाव में इसे सत्य मानते आए हैं। वैसे इसमें बहुत से लोगों को कोई गलती दिखती भी नहीं है क्योंकि कांग्रेस की देशवासियों को बेवकूफ बनाने की फितरत शुरू से रही है। एक ऐसा ही दावा कांग्रेस करती है देश में कम्प्यूटर को लाने का।
सारे कांग्रेसी यह डींगे मारते नहीं अघाते हैं कि देश में कम्प्यूटर लाने वाले राजीव गांधी थे। इस दावे को अक्षरश: सच मान कर तमाम कृतज्ञ देशवासी नतमस्तक भी होते रहते हैं और आगे भी होते रहेंगे। पर इस दावे में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं है।
राजीव गांधी और कम्प्यूटर के बारे में दावा इतनी छाती ठोंक - ठोंक कर किया जाता है मानों राजीव गांधी न होते तो आज भी हम पोथी और स्लेट के युग में बैठ कर कलमें घिस रहे होते।
अब समय आ गया है कि हम इस दावें की असलियत जानें। कांग्रेसी ऐसे बोल बोलते हैं जैसे राजीव गांधी के 1984 में सत्ता संभालने के पहले भारत कम्प्यूटर नामक चिड़िया की ABC भी नहीं जानता था।
दावा ये किया जाता है राजीव गांधी ने देश को पहली बार कम्प्यूटर से परिचित कराया था। वास्तव में इसका श्रेय देश की कुछ उन निजी कम्पनियों को दिया जाना चाहिए, जिनकी कम्प्यूटर को भारत में लाने तथा उसे लोकप्रिय बनाने की जिजीविषा को कभी वह सम्मान नहीं मिला, जिसकी वे हकदार थीं।
देश में सबसे पहले स्वदेशी तकनीक से कम्प्यूटर को विकसित करने का श्रेय DCM Datasystems को दिया जाता है, जिसने 1972 में भारत में अपने कम्प्यूटर आधारित उत्पाद भारत में उतारे थे। इस कम्पनी ने अपने कदम बढ़ाते हुए तुरंत साफ्टवेयर के क्षेत्र में भी कदम रखे। याद रखिए कि यह राजीव गांधी के सत्ता संभालने के 12 वर्ष पहले की बात है।
हालांकि उससे 4 साल पहले यानि 1968 में स्थापित टाटा कन्सेलेटेन्सी सर्विसेज
(Tata Consultancy Services – TCS) देश में साफ्टवेयर विकसित करने का काम शुरू कर चुकी थी लेकिन उसका काम टाटा स्टील तथा यूटीआई व सैंट्रल बैंक जैसे कुछ प्रतिष्ठानों को पंच कार्ड और डेटा प्रोसेसिंग से सम्बन्धित टूल्स उपल्बध कराना था। बाद में TCS ने 1981 में अपना साफ्टवेयर डेवलपमेण्ट सेंटर पुणे में खोला।
वहीं शिव नदार की HCL 1976 में स्थापित हुई तथा उसने HP (Hewlett Packard) के साथ तालमेल कर भारत में कम्प्यूटर के उत्पादन का काम शुरू किया। भारत की दो दिग्गज आईटी कम्पनी इन्फोसिस (Infosys) और विप्रो (Wipro) 1981 में स्थापित हुई। Infosys का ध्यान जहाँ साफ्टवेयर पर अधिक था वहीं Wipro हार्डवेयर में अधिक रुचि दिखा रही थी। ये दिग्गज कम्पनियां आज भी अपने क्षेत्र में शानदार कार्य कर रही हैं। जहाँ तक भारत सरकार की आईटी के क्षेत्र में पहल की बात है तो उसने कम्प्यूटर मेन्टीनेंस कार्पोरेशन (CMC) नामक एक उपक्रम 1975 में स्थापित किया था तथा इसका मुख्य काम देश में तब स्थापित तमाम IBM कम्प्यूटर्स की मेन्टीनेंस करना था। बाद में इसे पहले अर्द्ध-सरकारी कम्पनी बना दिया गया तथा बाद में TCS को बेच दिया गया।
याद रखिए कि कम्प्यूटर के क्षेत्र में यह महत्वपूर्ण पहल राजीव गांधी के 1984 में पद पर बैठने से बहुत पहले कार्यान्वित हो चुकी थीं।
मूर्ख कांग्रेसी यह दावा भी करते हैं कि भारत में सरकारी दफ्तरों में कम्प्यूटर लगा कर उसे लोकप्रिय बनाने का काम राजीव गांधी ने किया। तो इस का सीधा सा उत्तर है कि वह समय था जब देश में कम्प्यूटर को लगाना अवश्यम्भावी था। आज दुनिया का पिछड़े से पिछड़े देश में सारा काम कम्प्यूटर के माध्यम से हो रहा है, तो क्या वहां भी राजीव गांधी जैसे किसी कम्प्यूटर भागीरथ ने पहाड़ों से लाकर देश में कम्प्यूटर प्रतिस्थापित किया था।
मुख्य तथ्य तो यह है कि तकनीक को ओढ़ने और प्रयुक्त करने का समय जब जब होता है तब तब ये अ
ना रास्ता स्वयं खोजती हैं। विश्व में आज कोई भी ऐसा देश नहीं है जहाँ आईटी तकनीक का प्रयोग छोटे से छोटे से काम में नहीं किया जाता हो। और जहाँ तक भारत के साफ्टवेयर हब बनने की यशोगाथा की बात है तो इसमें टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो, जैसी कम्पनियों की मुख्य भूमिका थी न कि कांग्रेस सरकार की, जो बड़ी बेशर्मी से श्रेय लेने की कोशिश करती है।
और यदि राजीव गांधी वास्तव में देश में कम्प्यूटर लाए थे, तो मुझे विश्व के किसी भी उस देश का नाम बता दीजिए जहाँ राजीव गांधी जैसे नेता के अभाव में कम्प्यूटर तकनीक वर्ष 2000 तक न पहुंची हो?
आज से लाखों वर्ष पूर्व मानव ने चकमक पत्थर से आग जलाना सीख लिया था। पहले मानव पत्थरों का प्रयोग हथियारों के रूप में करता था, क्योंकि जंगली जानवरों से अपनी सुरक्षा के लिए उसे नैसर्गिक प्रस्तरखंड ही सहज रूप में उपलब्ध थे। इन प्रस्तरखंडो से जानवरों का शिकार कर उसने अपनी भोजन की समस्या का हल भी ढूंढ निकाला। उसने पत्थरों को धारदार बनाकर उन्हें चाकू व छूरी की तरह बनाया, ताकि शिकार करते में उसे आसानी रहे। ऐसी प्रस्तरयुगीन कई हथियार दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित हैं।
    ताम्रयुगीन क्षेत्र
दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में ताम्रयुगीन मानवकृतिवाले हथियार और भालेवाले हथियार भी प्रदर्शित है। ये उत्तर प्रदेश के जिला बदायूं के निकट की सोत नदी और उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर के पास की किसी नदी से मिलते है।
    संसार की ताम्रयुगीन सभ्यताओं में कुल्ली, झोब, अमरीनल और केटा की सभ्यताएं अधिक विकसित और प्रसिद्ध रही है। भारत मंे उत्तर प्रदेश का रूहेलखंड क्षेत्र प्राचीनता की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहा है। इस क्षेत्र से मानव के प्राचीनतम पुरावशेष लगभग छह हजार वर्ष पुराने, अब तक पुरान्वेषियों को मिल पाये है। छह हजार वर्ष पूर्व अर्थात् सिंधु सभ्यता से पूर्व की सभ्यता जिसे ‘ताम्रयुगीन सभ्यता’ भी कहते हैं, किसी समय इस क्षेत्र में विकसित थी। प्रमाणस्वरूप ताम्रयुगीन सभ्यता के पुरावशेषों में वे भालेनुमा हथियार और तांबे की मानव आकृतियां महत्वपूर्ण हैं, जो गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारों से मिली हैं।
    सोत नदी के तट से प्राप्त एक ताम्रयुगीन हथियार मथुरा के राजकी पुरातत्व संग्रहालय को चंदौसी पुरातत्व ‘ग्रहालय ने अभी हाल में ही भेंट किया है। यह हथियार वहां विशेष महत्व के साथ प्रदर्शित है। इसका आकार लगभग नौ इंच है और इसकी बनावट इतनी परिष्कृत है कि देखकर आश्चर्य होता है। ऐसे हथियार बिसौली के समीप से भी मिले है।
    इस हथियार अथवा भालफलक का तांबा इतना शुद्ध है कि परातत्ववेता अचंभित है। यह हथियार चंदौसी संग्रहालय के संस्थापक सुरेन्द्र मोहन मिश्र को एक ग्रामीण द्वारा दिया गया था। उसे वह नदी के किनारे खेत की जुताई के दौरान मिला था और उसके फावड़े की चोट से खंडित हो गया था। अतः वर्तमान स्थिति में वह शस्त्र दो भागों में है।
    जनश्रुतियों का करिश्मा
    इस हथियार के समाचार जब समाचार-पत्रों में छपे तो आम जनता में कौतुहल जागा, क्योंकि संवाददाताओं ने जनश्रुतियों के आधार पर इसे भगवान राम का बाण घोषित किया था। संसद में इस पर बहस हुई और स्पष्टीकरण के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से जानकारी लेने को कहा गया। पुरातत्व विभाग ने चंदौसी संग्रहालय से इसका विवरण तार द्वारा मांगा।
    कानपुर के पास बिठुर नामक स्थान पर आज भी एक मंदिर में तांबे के इन शस्त्रों की पूजा भगवान राम के बाणों के रूप में होती चली आ रही है। एक जनश्रुिित के अनुसार, ये हजारों वर्षे पहले छोडे गये भगवान राम के ही बाण है। हजारों वर्षो से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही ये मान्यताएं भारत के प्रायः उन सभी स्थानों पर प्रचलित है, जहां पर इस तरह के हथियार मिलते रहे हैं। लेखक द्वारा ताम्रयुगीन ध्वंसावशेषों की शोध के दौरान इस क्षेत्रों के ग्रामीणों ने जो जानकारियां दी हैं, उनके अनुसार उन्हें काफी पहले यहां पांच-पांच फुट बड़े शस्त्र और मानव आकृतियां मिली थी। जिन्हें उन्होंने बर्तन-विक्रेताओं को गलने के लिए दे दिया। जिन बर्तन-विक्रेताओं ने इन्हें खरीदा था, उन्होंने भी इस तथ्य की पुष्टि की है।
    ताम्रयुगीन काल की कुछ तांबे की मानव सदृश आकृतियां भी संग्रहालयों को मिली है, जिनके उपयोग के विषय में अभी मतभेद है। कुछ पुराविद् इन मानवकृतियों को पूजा के उद्येश्य से बनाया गया बताते हैं, तो कुछ विद्वान इन्हें ‘बुमैरंग’ किस्म का हथियार बताते है। यह हथियार शत्रु पर प्रहार करने के बाद शिकारी के पास वापस आ जाता था। दूसरा मत सत्यता के कुछ अधिक समीप लगता है, क्योंकि इस मानव आकृति के शीर्ष भाग को विशेष रूप से मोटा बनाया गया है, ताकि संतुलन और गति इसके उद्येश्य को पूर्ण कर सकें। ऐसे हथियारों में कुल्हाड़ी की तरह का शस्त्र भी प्राप्त हुआ है।
    रूहेलखंड की नदियों के तट से प्राप्त ये शस्त्र इस बात के द्योतक है कि यहां आज से छह-सात हजार वर्ष पूर्व एक ऐसी सभ्यता विकसित हो रही थी, जिसे इस क्षेत्र की प्राचीनतम सभ्यता कहा जा सकता है।
    इन हथियारों का प्रयोग करने वाले लोगों का रहन-सहन और खानपान कैसा था, यह ज्ञात करने के लिए जहां इन पुरावशेषों का सहारा लेना पड़ेगा, वहीं इन शस्त्रों के प्राप्ति-स्थान का भी सर्वे करना जरूरी होगा। प्रस्तर युग के किसी भी प्रकार के चिन्ह इस क्षेत्र से अब तक मिल सके हैं। यही कारण है कि रूहेलखंड के प्राचीन इतिहास को ताम्रयुग से ही प्रारंभ हुआ माना जाता है।
    यदि भारतीय पुरातत्व विभाग उन ऐतिहासिक स्थानों की गंभीरता से खोजबीन करें, जहां ताम्रयुगीन हथियार मिले हैं, तो हो सकता है कि भारत का ताम्रयुगीन इतिहास अमरीनल, झोब, केटा और कुल्ली सभ्यताओं से भी विशाल बन सकें।

अतुल मिश्र
संसार के विभिन्न देशों में आग और उसके अविष्कारक से सबंधित अनगित पौराणिक कथाएँ (मिथक) आज भी प्रचलित हैं, जो बाहतः अत्यंत ही दिलचस्प हैं पर सारतः हैं काफी गंभीर व महत्वपूर्ण। इन्हें मात्र कपोल-कल्पना नहीं कहा जा सकता क्योंकि इन मिथकों की रचना, उन आदिम लोगों ने की, जो संसार का बोध पाने, उसे समझने, उसमें अनिवार्य संबंध देख पाने तथा कार्य-करण संबंध ढूंढ पाने की कष्टसाध्य कोशिश कर रहे थे।
    ग्रीक आख्यानों में प्रोमैथ्यूज का उल्लेख मिलता है, जो अग्नि को स्वर्ग से चुराकर मृत्यु लोक में लाया था। वास्तव में प्रोमैथ्युज ग्रीक पुराण कथाओं का महान् सांस्कृतिक नायक है, जो टिटन आयोपेटस व क्लाईमीन का पुत्र और एटलस मेनोईटस व एवी मैथ्युज का भाई था। इसोइड ने उसकी कथा इस प्रकार कही है- एक बार ज्यूस के शासन के अधीन देवताओं और मनुष्यों के बीच मैकोन में यह विवाद उठा कि बलि-पशुओं का कौन सा अंश देवताओं को अर्पित किया जाए। प्रोमैथ्यूज ने ज्यूस की परीक्षा लेने हेतु एक बैल को मारकर उसके सवोत्तम अंश को गोबर से ढक दिया तथा दूसरी और केवल हड्डियों की चर्बी से ढक कर रख दिया। ऐसा करने के बाद ज्यूस से चुनाव करने के लिए कहा गया किन्तु जब उसकी समझ में यह कपट जाल आया तो उसने मांस फेंकने के लिए आग को बाहर निकाला, लेकिन साथ ही साथ उसने यह वर्जना भी रखी की पृथ्वीवासी आग का इस्तेमाल न करें। यह देख प्रोमैथ्युज चालाकी से एक खोखली नली में अग्नि चुराकर धरती पर ले आया।
    कुछ भारतीय विद्वानों का मानना है कि ग्रीक आख्यानों का यह नाम, प्रोमैथ्यूज का उद्भव संस्कृत पद प्र$मंथ से हुआ है। क्योंकि अग्नि का आर्विभाव पहले मंथ प्रक्रिया से किया गया था। इस आधार पर उसके विश्लेषण के अनुसार, प्रोमैथ्यूज के नाम से संबंध पुराण-कथा का उद्भव भी भारत में हुआ और यहीं से विदेशों में फैली, इस सदंर्भ में चैम्बर्स विश्वकोश में दी गई बातें ध्यान देने योग्य हैं।
    ग्रिफिथ के अनुसार (जिसने यजुर्वेद के मंत्रो का अनुवाद किया था) .............. आप पुरीष्य (पशु-पोषक) है, विश्व-भर के आश्रम हैं, अर्थवन ने ही, हे अग्नि! सबसे पहले आपका मंथन किया था। हे अग्नि! अर्थवन ने कमल से मंथन करके पुराहित विश्व के सिर पर तुम्हारा आर्विभाव किया था। ‘त्यागमग्ने पुरूष्करादध्यथर्वा निरमंथत। मूघ्नो विश्वस्य बाधतः’ (ऋ 6.16.13, यजु. 15.22)
 अर्थवन या अथर्वा, जिन्हें अंगिरस भी कहा जाता है, संभवत आग के पहले आविष्कारक थे। इसीलिए उनका नाम अंगिरस हो गया। उनके नाम पर अग्नि का मंथन करने वालों की पूरी जाति अंगिरस के नाम से विख्यात हुई। आज भी भारत में इस गोत्र के लोग मौजूद हैं। यह भी कहा जाता है, उसका हिन्दी भाव इस प्रकार है-
    यजुर्वेद के श्लोक (8ः56) पर ग्रिफिथ की, जो टिप्पणी है, उसका हिन्दी भाव इस प्रकार है-
    अर्थवन एक प्राचीन ऋषि, जिसने सर्वप्रथम आग की खोज की तथा अग्नि की पूजा शुरू करवाई। इनके द्वारा अग्नि की खोज किए जाने के बाद बहुत से अंगिरस गोत्रीय आग के मंथनकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हुए, जिनकी चर्चा वेदों में अनेक जगह की गई है। उस समय लकड़ी से सफलतापूर्वक आग निकालना आसान काम नहीं था।  इसलिए तत्कालीन समाज मंे अंगिरसों की बड़ी आवभगत होती थी।
    इस संदर्भ में विल्सन का कहना है कि ऋग्वेद में अंगिरस शब्द का प्रयोग अग्नि के पर्याय के रूप में किया गया है, जबकि उनका नाम मनुस्मृति तथा सभी पुराणों में एक ऋषि या प्रजापति के रूप में किया गया है, उनके ब्रह्मा का एक रूप आदिम मानुसपुत्र बताया गया है।
    यदगदाशुषे त्यमग्ने भद्रं करिष्यसि। तयेत्तत् संत्यमडिगरः। (ऋ. 1.1.6)।
    मनुष्यमदग्ने अगिरस्मर्दागरा ययाति वत्सदने पर्ववच्छुये।। (1.31.17)
अर्थात् हे, विशुद्ध अग्नि, तुम चलते रहो, वेदी सदन के सम्मुख जाओ, जैसे मनु, अंगिरस ययाति और अन्य लोग पहले जाया करते थे।
    महाभारत में एक कथा है, जिसमें अग्नि को ‘सह’ बताया गया। राजा भरत के पुत्र नियम के दाह-संस्कार के समय अग्निदेव समुद्र में जाकर छिप गए। वास्तव में वह नियत के दाह-संस्कार में हिस्सा लेना नहीं चाहते थे। जब देवताओं ने यह देखा कि अग्नि गायब है तो उनकी खोज में निकले। घूमते हुए धरती पर पहुँचे। उन्होंने अर्थवन को यह काम सौंपा। कठिन परिश्रम के बाद अर्थवन ने लकड़ी से अग्नि पैदा की तथा देवताओं का काम चलाया।
    भारत की तरह टोगा द्वीप-समूह में, जो प्रचलित धारणा है, वह भी यथार्थ के निकट लगता है। इस द्वीप समूह में आज भी ऐसा कहा जाता है कि भूकम्प के देवता ही आग के देवता हैं। मंगाइयों में अनुरूुति के महान् माउई नरक में गया, जहाँ उसने दो लकडि़यों को रगड़कर आग पैदा करने के रहस्य का पता लगाया। माओरी जाति के लोग इसे दूसरी तरह कहते हैं। उनके अनुसार, माउईने बुढ़ी, दादी माहुईका से आग प्राप्त की, जिसने अग्नि अपने हाथ के नाखूनों से निकाली थ।
    फिनलैंड की प्राचीन कविताओं में पाया जाता है कि सूरज का बेटा-आग स्वर्ग से नीचे ले आया। एस्तोनियों में प्रचलित दंतकथा के अनुसार, वहाँ के स्थानीय देवता उक्को ने अपने लोहे के डंडे से पत्थर पर चोट करके अग्नि पैदा की। वेस्टर्न प्वाइंट, विक्टोरियों के आस्ट्रेलियावासियों में यह धारण प्रचलित है कि भले बूढ़े पुणदिल ने अपने संदूक का द्वार खोल दिया और उसका प्रकाश धरती पर पड़ा। भले आदमी का लकड़ी कराकोरक ने जब धरती को सांपो से भरा हुआ पाया तो वह सांपो को नष्ट करती हुई हर जगह गई पर इसके पहले कि वह सभी सांपो का नाश कर पाती, उसकी लाठी दो हिस्सों में टूट गई। उसके टूटते ही उससे आग की ज्वाला निकली। फारसी के ‘शाहनामा’ में भी आग की खोज करने वालों को, नागों को मारने वाला बताया गया है। प्रतापी नायक हुर्शेक ने भयानक सांप के ऊपर बड़ा भारी पत्थर फेंका, जो सांप के एक ओर हट जाने से एक दूसरी चट्टान से जा टकराया और उससे चिंगारियां फूट पड़ी। पेरूवासियों के पिता गुना मानसुरी ने गुलेल से पत्थर फेंक कर बिजली और गरज पैदा की थी।
    ऊपर जितनी भी बातें आई हैं, उसका संबंध प्राचीन मिथकों से हैं। इनमें सच्चाई की मात्रा कितनी है, निर्णय के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन लगभग सभी कथाओं में घर्षण से आग उत्पन्न करने की बात दिखती है, जो वास्तविकता भी है। क्योंकि आज से हजारों वर्ष पहले ‘होमोइरेक्टस’ (सीधा तना हुआ मानव) घर्षण से आग पैदा करता था। इससे पुरातत्वेता व इतिहासज्ञ भी मानते हैं। रही बात अग्नि के आविष्कारक की, तो इस संदर्भ में कई भारतीय इतिहासकारों का दावा है कि वास्तव में अंगिरस ने ही सर्वप्रथम अग्नि का आविष्कार किया।

-सुभाष सरकार

कुंभकर्ण ने एक से एक बढ़कर अलौकिक शस्त्रों के आविष्कार भी किये थे, जैसे शत्रु को अंधा, बहरा, पागल कर देने वाला दर्शन श्रवण्पा यंत्र आदि।
    हजारों वर्षो के भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं भूगर्भ शस्त्र के महान विद्वानों द्वारा की गयीं आधुनिक नवीनतम खोजों के अनुसार जिस प्रकार यह सत्य सिद्ध हुआ है कि रावण की वास्तविक रामायण कालीन लंका जो शून्य अंश-अक्षांस तथा 15 दशमलव 50 अंश देशांश पर स्थित थी, समुद्र में डूब चुकी है, उसी प्रकार यह रोमाचंक सत्य भी सामने आया है कि रावण का तीसरा भाई कुंभकर्ण अनुपम योद्धा, पं्रचड ईश्वर-भक्त तथा प्रसिद्ध शिक्षक होने के साथ ही संसार के प्रसिद्ध वैज्ञानिक भी था। जैसे वर्तमान श्रीलंका अब वास्तव में में रामायणकालीन सिंहल द्वीप मानी जाने लगी है वैसे ही कुंभकर्ण के संबंध की अब तक की यह मान्यता भी झूठ साबित हुई है कि वह महान आलसी, छह माहों तक सोने वाला तथा छह माहों तक जागने वाला केवल एक निकम्मा लंपट राक्षसराज था।
    सच्चाई यह है कि वह गुप्त रूप से लंका से छह माहों के लिए अमरीका व हिमालय के भयानक जंगली क्षेत्रों में जाकर वहां न केवल विज्ञान के नये प्रयोग करता था, बल्कि अपने बनाये अंतरिक्षयानों में बैठकर मंगल, बुध आदि अनगिनत ग्रहों की सैर कर लंका वापस लौटकर छह माहों तक वहां की प्रसिद्ध प्रयोगशालाओं में छात्रों में को अपने खोजपरक ज्ञान से परिचित कराता था। यह कुंभकर्ण की वैज्ञानिक सिद्ध शक्तियों का ही प्रताप था, जिसके बल पर रावण ने इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित किया था। जिसका विशालता की टक्कर इस धरती पर कोई नहीं ले सकता। (संभयतया) पाठक जाने ही हैं कि रोवण के साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था और वह लंका, विंध्याचल पर्वत के दक्षिण का भारत आस्ट्रेलिया, पूर्वी द्वीप समुदाय, साईबेरिया, चीन, अफरीका, ईरान, अफगानिस्तान, अरब, मिस्त्र, द. अमेरिका तथा अब जलमग्न अटलांटिस और म्यू द्वीपों तक फैला था।
    राम के समकालीन महर्षि श्रृंगी व उनके प्रिय शिष्य महानंद के ग्रंथो, वाल्मीकि रामायण, तेलगु की कम्ब तथा रंगनाथ रामायणों, कन्नड़ की परंपरागत तथा मलयालम की आध्यात्मक रामायण सहित अनेक ऋषियों तथा संस्कार धानी जबलपुर के विद्वान श्री गोमती शंकर शुक्ल के अत्यंत मौलिक ग्रंथ ‘गाथा राम रावण’ में वर्णित तथ्यों के आधार पर कुंभकर्ण की रहस्यमयी वैज्ञानिक उपलब्धियों निम्नानुसार थींः

    अद्भूत प्रयोगशालाएं

    अति आश्चर्यजनक प्रतिभा के धनी कुंभकर्ण ने प्रांरभ से ही कट्टर सात्विक जीवन बिताया था तथा अपनी प्रचंड शिवभक्ति के बल पर ही उसने भगवान शंकर से रावण से भी बढ़-चढ़कर दुर्लभ वैज्ञानिक सिद्धियां प्राप्त की थी। महर्षि भारद्वाज के आशीष से निद्रा पर विजय प्राप्त कर वह रात-दिन अपने वैज्ञानिक प्रयोगों व अनुसंधानों में ऐसा जुटा था कि कुछ वर्षो में ही उसने इच्छा चालित विमानों, उड़नेवालें रथों, अद्भुत अंतरिक्षयानों तथा भयंकरतम अस्त्रशस्त्रों का आविष्कार कर सारी दुनिया में धूम मचा दी थी। रावण ने अपने लंका में उसी के सहयोग से संसार प्रसिद्ध दर्जनों विज्ञान विश्वविद्यालय तथा सैंकड़ों अद्भुत वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं खोली थीं, जिनका प्रमुख स्वयं कुंभकर्ण था जो अपने सहयोगियों सहित विद्यार्थियों को भौतिक व आध्यात्मिक विज्ञान का प्रशिक्षण देता था। साथ ही रावण ने जब खुद भगवान शंकर को लंका में आमंत्रित कर उन्हें अपनी ये प्रयोगशालाए दिखलायी थी, तब उन्होंने उन दोनों को आर्शीवाद देते हुए आदेश दिया था कि वे अपने आविष्कारों का सदुपयोग मानवता के कल्याण के लिए ही करें, क्योंकि विनाश के लिए करने से सारी सृष्टि का अंत हो जाएगा।

    वास्तविक कार्यक्षेत्र: दक्षिणी अमरीका

विद्वानों के कथनानुसार-कंुभकर्ण ने अपनी रहस्यमयी विज्ञान साधना के लिए भारत को कभी नहीं चुना। वह हिमालय तथा तिब्बत के साथ ही दक्षिणी अमरीका (उन दिनों का पाताल लोक) के पेरू, मेक्सिकों, एरीजोना, यूकातान, ग्वाटेमाला तथा होंडफराज आदि उन क्षेत्रों से संबंधित था जिसमें दुनिया के  लाखोां वर्ष पुराने मय सभ्यता वासियों का वास था। यह उसका सौभाग्य था, क्योंकि यूरोप के विश्वप्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक व इतिहासवेत्ता प्लेटों के ग्रंथों के अनुसार मय जाति के पूर्वज अंतरिक्ष के किसी अज्ञात ग्रह से उतरकर उपर्युक्त क्षेत्रों सहित अटलांटिस द्वीप (अब जलमग्न) में बस गये थे। द्रविड़ सभ्यता के पोषक राक्षसराज रावण ने उपर्युक्त क्षेत्रों में अपना साम्राज्य स्थापित किया तथा कुंभकर्ण सहित उसे भी मयजाति के लोगों से ही वैज्ञानिक अनुसंधानों व सिद्धांतों का अपार भंडार मिला था। प्राचीनमय-संस्कृति व सभ्यता के खोजी विद्वान क्रेग तथा एरिक अमलैंड के अनुुसार इन क्षेत्रों में उतरे दूसरे ग्रहवासी ही अपने साथ अंतरिक्षयान, बिजली, एक्सरे, टेलीविजन आदि की विद्या लाये थे। इस बात की पूर्ण संभावनाएं है कि वैज्ञानिक कुंभकर्ण ने भी उनसे ये विद्याएं सीखकर बदले में उन्हें भी अपनी स्वयं की वैज्ञानिक उपलब्धियों से परिचित कराया होगा। इस वैज्ञानिक लेन-देन से कुंभकर्ण को दूना लाभ हुआ और वह आविष्कारों की दौड़ में चमत्कारी रूप से सारी दुनिया में सबसे अधिक बढ़ चढकर माना जाने लगा था।

    सुदूर ग्रहों का भ्रमण

    रावण तथा अपने विशाल साम्राज्य को दुर्लभ वैज्ञानिकों उपलब्धियों (चमत्कारी, चिकित्सा पद्धति, एक्सरे, बिजली, दुरदर्शन फोटोग्र्राफी इच्छाचालित यानों उडन रथों, अंतरिक्ष यानों आदि) से समृद्ध कर सुदूर अंतरिक्ष ग्रहवासियों से संपर्क साधने की इच्छा से कुंभकर्ण ने  अपने अंतरिक्षयानों पर बैठकर जब पहली बार मंगल ग्रह की यात्रा की तो वहां से लौटकर उसने रावण को सूचित किया था कि मंगल में भी धरती वासियों जैसे मानव सभ्यता है, (आज की बीसवीं सदी के वैज्ञानिकों ने भी मंगल ग्रह में प्राणियों के होने की पुष्टि की है) कुंभकर्ण ने अंतरिक्ष में जहां-तहां घूमते विनाशक उल्का पिंडो का भी उल्लेख किया था।

    रावण के कारण सर्वनाश

    कुंभकर्ण ने एक से बढ़कर एक अलौकिक शस्त्रों के आविष्कार भी किये थे, जैसे शत्रु को अंधा, बहरा, पागल कर देने वाला दर्शन श्रवण यंत्र आदि। इस बीच रावण अपने विशाल साम्राज्य तथा विराट संपदा केू कारण दंभी व भयानक भ्रष्टाचारी होकर घोर आतंक फैलाता हुआ राम की सीता को चुरा लाया। इससे क्रुद्ध होकर स्वयं शंकर सहित समस्त देवताओं ने राम मदद की और उन्होेंने जब अपनी विशाल वानर सेना सहित लंका पर आक्रमण किया, तब रावण ने अपनी पराजय निकट जानकर कुंभकर्ण को राम से लड़ने के लिए बुलाया। कुंभकर्ण ने रावण को राम की सीता वापस देने की सलाह देते हुए जब उसे धिक्कारा तब रावण ने उसे कायर कहते हुए राम से युद्ध के लिए ललकारा।
        बस यहीं से कुुंभकर्ण की समस्त अलौकिक वैज्ञानिक उपलब्धियों का सर्वनाश होना प्रांरभ हो गया। यद्य़ति कुंभकर्ण को युद्ध करने का कोई सीधा अनुभव नहीं था, परंतु फिर भी उसने राम के विरूद्ध भीषण वैज्ञानिक युद्ध लड़ने का निश्चय किया। वह अकेला अपने बनाये पहाड़ की तरह विशाल फौलादी यंत्र दैत्य के भीतर बैठकर युद्ध भूमि में कूदकर राम की समस्त वानर सेना को गाजर-मूली की तरह काटने लगा। यह देश विभीषण कुंभकर्ण के पास उससे मिलने गये। कुंभकर्ण ने विभीषण से अपनी लाचारी का वर्णन करते हुए कहा, ‘‘ मुझे राम के अतिरिक्त कोई नहीं मार पाएगा और मुझे पता है कि मैं उन्हीं के हाथों मारा जाउंगा, क्योंकि मैने रावण की गलत आज्ञा मानकर घोर अपराध किया है जिसका सजा मेरी मृत्यु है।’’ विभीषणर ने वापस लौटकर राम को कंुभकर्ण का यह रहस्य समझाया कि जब तक उसके यंत्र दैत्य को नही गलाया जाएगा, तब तक वह नहीं मर सकता। विभीषण की चेतावनी को ध्यान में रखकर दूसरे दिन राम ने महर्षि विश्वामित्र द्वाीा दिये गये ऐसे अभिमंत्रित बाण कुंभकर्ण की ओर छोड़े जिनके कारण उसका पहाड़ जैसाप भीमकाय यंत्र दैत्य मोम की तरह गलकर नष्ट हो गया। जैसे ही कुंभकर्ण यंत्र दैत्य से बाहर निकला वैसे ही राम ने एक बाण से उसे मार गिराया। इस प्रकार अत्याचारी रावण कार साथ देने के कारण दुनिया के महानतम वैज्ञानिक कुुंभकर्ण  का दुखद अंत हो गया तथा उसी के साथ उसकी सारी वैज्ञानिक उपलब्धियां भी नष्ट-भ्रष्ट होकर लुप्त हो गयीं।
    कुंभकर्ण की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र सुमेतकेतु अपने पिता की वैज्ञानिकता में इसलिए कोई प्रगति नहीं कर सकता, क्योंकि वह काफी पहले से ही रावण की आतंककारी गतिविधियों से विरक्त होकर सन्यासी बन गया था।

    -दीवान गबहाुदर वल्लभदास

    महल, जबलपुर

प्राचीन भारतीय संस्कृति के तीन अवयव रहे हैं। आर्य संस्कृति वानर संस्कृति और राक्षस संस्कृति। आर्य (देव) संस्कृति हिमालय से विध्य की तलहटी तक प्रसृत थी। वानर का केन्द्र तत्कालीन किष्किंधाा नगरी थी। आज के महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेशों के कुछ हिस्सों से मिला हुआ वह एक विकसित और सुसंस्कृत क्षेत्र था। वानर संस्कृति के मूल्यांकन की गरिमा इससे भी बढ़ जाती है कि आर्य (देव) संस्कृति के प्रतिमान स्वरूप राम को
(आत्मानं मानुषं रामं दशरथात्मजम्-युद्धकांड) अपनी सहायता की अपेक्षा के लिए वानरराज सुग्रीव से मैत्री करनी पड़ी।
    राक्षस संस्कृति, उपर्युक्त दोनों संस्कृतियों से बढ़-चढ़कर थी। कदाचित आर्य संस्कृति के उद्भव से पहले ही, यह भारत में ही नहीं, बल्कि लंका-सहित, सुमात्रा, जावा, बोर्नियो, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका तक फैली थी। इन सभी क्षेत्रों में रहने वाले लोग राक्षस संस्कृति’ के अनुयायी थे। इस संस्कृति के उपनिवेश भारत के दंडकारण्य और नासिक में भी थे। रावण इस संस्कृति का उन्नायक एवं इन सभी क्षेत्रों का अधिपति था। दानवी एवं आसुरी संस्कृतियां राक्षस संस्कृति की पर्यायवाची थीं रावण के दबदबे से उन दिनों आर्य संस्कृति आकांत थी।
    आर्य और राक्षस संस्कृति राक्षस संस्कृति के उद्भव की कथा वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड एवं अन्यान्य पुराणों में उल्लिखित है। कहा जाता है कि प्रजापति ने जब क्षुधार्त मानवों की सृष्टि की तब वे सभी अपने स्वामी को ही खाने दौड़ पड़े। बेचारे प्रजापति व्यग्र हुए किंतु, उनमें से जिन्होंने कहा; ‘‘ऐसा मत करो, इनकी रक्षा करो’’, वे राक्षस कहलाये। जिन्होंने कहा, ‘‘इन्हें पकड़ो खाओ’’ वे यक्ष कहलाये-
    मैवं भोः रक्ष्यातामेष यैरूक्तंराक्षसास्तु ते।
    ऊचुः खादामेद्वत्यन्ये येते यक्षस्तु यक्षणात्।।
    (विष्णु-पुराण)
    इस तरह ‘वयं यक्षामः’ के आधार पर आर्य संस्कृति और ‘वयं रक्षामः’ के उच्चारण से राक्षस संस्कृति का नामकरण हुआ। यक्ष संस्कृति व्युत्पलिभ्य अर्थ है- यक्षते पूज्यते इति यक्षः। यह पूजा और भोग पर आधारित है। राक्षस संस्कृति में दाक्षिणात्यों की सोम (चंद्रवंशीय) और उत्तराखंड की रवि (सूर्यवंश्ीाय संस्कृति का मधुयोग है। राक्षस शब्द में दो व्यंजनाएं हैं- रा$क्षस। ‘क्षस्’ सोमवती या यक्षी संस्कृति का अंश विशेष है और ‘रा’ में रवि संस्कृति की प्रोज्ज्वलता है।

दो संस्कृतियों में एकता

    परंपरागत रूप से भी, इन दोनों संस्कृतियों में हार्दिक संबंध रहा है। इनकी भिन्नता मूल में नहीं, अपितु विचार-विकास के कारण रही है। आर्य-कुलोद्-भूत कश्यप की दनु, दिति और अदिति नाम की तीन पत्नियां थीं। दनु से दनुज, दिति से दैत्य, अदिति से आदित्य (देव) उद्भूत हुए। रावण के पितामह पुलस्त्य आर्यकुल के थे। पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा ने राक्षस-कन्या कैकसी और कंचकेशी से विवाह किया। कैकसी के रावण, कुंभकर्ण एवं शूर्पणखा तथा कंचकेशी से विभीषण और त्रिजटा नाम की संतानें उत्पन्न हुई। विश्रवा के प्रथम पुत्र विश्रवण-कुबेर थे। कुबेर यक्ष संस्कृति के नियामक के रूप में लंका के अधिपति बने। तात्पर्य यह है कि आर्य संस्कृति और राक्षस संस्कृति का ही आसुरी संस्कृति नामकरण करके कोसा गया है। असुर शब्द ‘असु’ धातु से व्युत्पन्न है। कौत्सुक्य निघंटु में ‘असुर’ मेक्ष का घोतक है। ‘अवेस्ता’ में यही ‘अहुर’ है। ‘अस’ का अर्थ प्राण्सा है, जो उत्क्षेप और अवक्षेप दोनों का बोध कराता है। प्राणियों को प्राण शक्ति से अनुप्राणित करने वाली प्रत्येक औषध को आसुरी कहा गया है।

    संपादक रावण

उन दिनों वेद की ऋचाएं श्रुत-रूप में ही विद्यमान थीं। रावण ने उनका नये सिरे से संपादन किया और उन पर व्याख्याएं लिखीं। उन व्याख्याओं के अंतर्गत उसने लोकाचार को भी सन्निहित किया। इस आधार पर अपने को श्रेष्ठ समझने वाली आर्य संस्कृति ने रावण द्वारा प्रतिपादित व्यावहारिक आचार-पऋति के अनुगामियों को अपने खेमे से बहिष्कृत मानकर, उन्हें अनार्य (व्रात्य) की संज्ञा दी, किंतु आर्य संस्कृति से वहिष्कृत लोगों में केवल राक्षस नहीं थे, अपितु वानर और ऋक्ष भी थे। आर्य संस्कृति के पाणिनि पुरूष राम ने वानर और ऋक्ष जातियों से मित्रता स्थापित करकेे, राक्षस संस्कृ    ति से टक्कर ली। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि आर्य और राक्षस संस्कृति के बीच कोई जातिगत विद्वेष नहीं था, विचारगत वैषम्य अवश्य था। राक्षसांे के जीवन व्यवहार को ‘वामाचार’ की संज्ञा देकर उन्हें हीन, अपावन समझा जाने लगा। रावण लिंग पूजक के रूप में ‘रूद्र’ का उपासक था। उस समय सृष्टि विकास की प्रकृतिया आरंभावस्था में थी। प्रभूत मात्रा में प्रजनन अपेक्षित था। इसलिए राक्षस-संस्कृति का संरक्षण कर्ता रावण जहां भी जाता थ, अपने एक हाथ में सुवणर््एा निर्मित एक लिंग प्रतिमा लिये रहता था! रूद्र की प्रतीक उस लिंग की वह उपासना करता था। इस उपासना की तात्तिवक व्याख्या ‘छांदोग्य’ और ‘वृहदारण्यक’ में एक रूपक के माध्यम से स्पष्ट की गयी है ‘‘ स्त्री ही अग्नि है, शिश्न ही समाधि है, योनि ज्वाला है, आकर्षण धूप है, प्रवेश अंगार है, आनंद चिनगारी है, वीर्यपात ही आहुति है, इस आहुति से गर्भ उद्भूत होता है।’’
    भौतिक प्राणियों में जीभ और योनि की स्थिर स्थिति नहीं होती। इनकी चंचलता से सभी व्यथित रहते हैं। इनका निर्बाध प्रवेश जीवन को अधेमुख कर देता है। साधना के द्वारा सर्वप्रथम इन्हें परितोष देने के बाद ही, जीवन के उर्ध्वगामी होने की संभावना होती है। अतिशय भोग से जीभी और योनि को परितृप्त करके शिथिल बना देने की प्रकृतिया ही ‘वामाचार’ है। इस स्वदेश के बौद्धों ने अपनाया, विदेशा की समुन्नत संस्कृतियों ने ग्रहण किया। आज भी इस दार्शनिक साधना की अपनी विशेष अक्षुण्ण है।
    ‘कृष्णयजुर्वेद’ में संग्रहीत रावण की अधिकांश वेदोक्तियां आज आर्यो को मान्य हैं। उसको आराध्यदेव रूद्र की शिव के रूप में उपासना करने की पद्धति वे नहीं छोड़ते। राक्षस (दानव) वंश में पैदा होने वाले विश्वकर्मा को देवत्व की उपाधि से विभूषित करनें में वे नहीं चूकते। उसके भाई कुबेर (विश्रवण) को लंका का राज देकर उसे दिक्पाल बनाने की साजिश से नहीं चूकतें। किंतु राक्षस संस्कृति और उसके नियामक रावण के प्रति सहय दृष्टि रखने सेे ही न जाने क्यों चौंक उठते है?

    राक्षस सुंदरियों का विहार

रामायणकालीन राक्षस संस्कृति के रेख-रंग की कुछ अनुपम झांकियां प्रस्तुत की जाती है। शायद इससे उस संस्कृति के गौरव-स्तर का कुछ अनुभावन हो सके। कला और विनोद किसी भी संस्कृति का भावात्मक बोध है। इससे जीवन के प्रति उस संस्कृति के सात्विक दृष्टिकोण का पता चलता है। कला के प्रति रूझान से मानसिक रेचन होता है। लंका-नगरी का निर्मितियां कला की श्रेष्ठ निर्देशिका रही हैं। यद्यपि रात में यहां मधुमयी ज्योत्सना बगर जाती, तथापि प्रत्येक मंदिर असंख्य दीपों के प्रकाश में खिल उठता है। राक्षसेंद्र का अंतः पुर हेम एवं मणि-खचित कलात्मक चित्रों से संपूरित था। अंतः पुर की रमणियां बहुविध वेशों में सुशोभित, रंग-बिरंगे वसनों एवं सुवासित मालाओं से सुसज्जित लंकाधिपति को प्रेम-प्रतिदान देने में जुटी रहतीं।
लंका की अद्भुत निर्माण कला
लंका नगरी की निर्माण कला तो अद्भुत थी ही, उसकी रक्षा के लिए लंगा दुर्ग की रचना भी अतिशय प्रशंसनीय थी। पुरी के चतुर्दिक िचार प्रशस्त द्वार थे। सशक्त अर्गलाओं सहित, उनमें अभेद्य किवाड़ लगे हुए थें। उनमें ऐसे प्रबल यंत्र संयत्रित थे, जो शत्रुओं के आक्रमण को विफल कर देते थे। नीलमणियों से जटित पुरी के चतुर्दिक परकोटे बने हुए थे। परकोटों के चारों और जलभरी अभेद्यखाईयां थी। उन खाइयों पर अनेकानेक पुलों का निर्माण किया गया था। चारों दरवाजों पर चार महारथी चतुरंगिणी राक्षस सेनाओं के साथ नियुक्त रहते।
    मल्लयुद्ध-विद्या में पांरगत होने के लिए स्थान-स्थान पर अखाड़े बने हुए थे। राक्षस किशोर नित्य उन अखाड़ों में लड़ा करते थे। कहा जाता है कि राक्षसेंद्र अन्य राजाओं की तरह घूत-क्रीड़ा का व्यसनी नहीं था, बल्कि वह बुद्धि-विलास के लिए शतरंज खेला करता था। 

    युद्धक विमानोें से लैस सेना

राक्षस संस्कृति युद्ध-चित्रांकन (वॉर फोटोग्र्राफी) में भी बढी-चढ़ी थी। रावण के पास विद्युज्जिह नाम का एक राक्षस कलाकार था। सभी उसकी कला के कायल थे। रावण ने उस कलाकार से राम के मृतक रूप के एक बनावटी सिर के निर्माण का आग्रह किया जाकि उसे दिखाकर वह सीता को अपनी ओर आकर्षित कर सके। विद्युज्जिह ‘मृतक राम’ के सिर की सटीरक अनुकृति बनाकर रावण के साथ अशोक वाटिका में गया। सीता, उस बनावटी सिर को राम का वास्तविक सिर समझकर विलाप करने लगी। उनके नयन, मुख, वर्ण, केश आदि सभी अवयवों को राम जैसा ही मान बैठीं। सीता विदुषी थीं, वयस्कां थीं, फिर भी वे वास्तविकता न पहचान सकीं। इसका तात्पर्य यह है कि राक्षस संस्कृति में रूप-निर्माण की कला पूर्ण विकसित थी। इसकी गरिमा का आंकलन इस तर्क-बल पर और बढ़ जाता है कि जिस राक्षस कलाकार ने राम के बनावटी सिर का निर्माण किया था, निश्चय ही, उसने राम की आकृति बडी दूर से उतारी होगी। कारण, राम अपने ऋक्ष-वानर सैनिकों से सदा घिरे रहते थे। उनके समीप किसी शत्रु का पहुंचना सरल नहीं था। इतनी दुरी से ऐसी सही आकृति खींच लेने की घटना राक्षस संस्कृति की युद्ध चित्रांकन कला में चार चांद जड़ देती है।
    राक्षसों का युद्ध-विज्ञान भी बढ़-चढ़कर था। राम की अमित सैन्य-शक्ति से जब रावण को कुछ परेशानी महसूस हुई तब बज्रदंष्ट्र नामक उसके एक महारथी वरिष्ठ मंत्री ने उसे यह कह आश्वस्त किया ‘महाबली! राम की सेना के समान ही, मैं एक सहस्त्र राक्षस सेना का निर्माण करके उसे राम की सेना में घुसा दुंगा,’ यह कहकर कि इसे भरत ने भेजा है। वह राक्षस सेना राम की सेना में मिलकी उसके रहस्यों को जान ले। तब तक हम लोग आकाश-मार्ग से, ध्रती पर अपनी उस बनावटी सेना की सहायता से राम की विशालवाहिनी का विनाश कर देंगे।’
    इससे निष्कर्ष निकलता है कि राक्षस मनचाहा रूप धारणप कर सकते थे। ब्रजद्रंष्ट्र ने आकाश में ‘गणशः’ स्थित होने की बात भी कही है। इसका अर्थ यह है कि राक्षस सेना आकाश में समूहगत रूककर युद्ध अभियान करने में सक्षम रही। युद्ध विज्ञान की ऐसी विद्या आज भी आविष्कृत नहीं हो सकती है।
    राक्षस ‘पाणिलाघव’ युद्ध-विज्ञान में भी कुशल थे। अपने सारथि के मारे जाने पर इंद्रजित ने स्वयं रथ और बाण साथ-साथ चलाने का कौशल दिखाकर राम के सेनापतियों को विस्मय डाल दिया। रावण का पुष्पक विमात तात्कालिक कला कौशल का सवोत्कृष्ट नमूना माना जाता था।

    वेदपाठी रावण

    आर्य संस्कृति की तरह, राक्षस संस्कृति में भी यम-नियम एवं जीवन के प्रति उदात्त दृष्टिकोण विद्यमान थे। लोगों की सामान्य धारणा कितनी कलुषित बना दी गयी है, कि राक्षस का अर्थ ही आततायी, क्रूर, भ्रष्ट और अविवेकी। विभीषण सीता को छुड़ाने के लिए रावण के महल में प्रातः काल पहंचुते ही देखता है कि यथाविधि पूजा करने के बाद, वेदपाठी ब्राह्मणों को संतुष्ट करके रावण उनसे आशीर्वाद ग्रहण कर रहा है।
    लंका में प्रवेश करते ही, हनुमान ने कतिपय राक्षसों को वेदपाठ करते देखा। उनके कानों में वेदो के सस्वर उच्चारण की ध्वनि गूंज उठी थी।
    उत्तरकांड में उल्लिखित प्रसंग के अनुसार रावण ने निवातकवचों के साथ अग्नि को साक्षी देकर मित्रता स्थापित की थी। इससे सिद्ध होता है कि राक्षस भी आर्यो की भांति अगिन के उपासक थे।

    सौंदर्यशाली रावण

    उदार-भाव की सार्वजनीनता सभी संस्कृतियों में समान रूप से व्याप्त है। नारी की सौंदर्यशीलता और पुरूष का सौंदर्य औदात्य किसी खास संस्कृति के भाग नहीं होते। लोगों में यह भ्रांत धारण परिव्याप्त है कि रावण ने अनेक सुंदरियों का शील-भंग करके बलपूर्वक उन्हें अपने अंतः पुर में रख छोड़ा था, उसके सम्मुख संदरियां कैसें अपने आंचल फैला सकती थी! रावण के अंतःपुर में कोई भी ऐसी रमणी नहीं थी जो विवाहिता न रही हो और बलपूर्वक हरण कर ली गयी हो। अंतःपुर की सभी रमणियां स्वयं आकर्षित होकर उसके रनिवास की शोभा बनी थीं।
    अंतःपुर की इन रमणियों से पृथक् निरे एकांत में पलंग पर सोयी एक रूप-संपन्न रमणी को हनुमान ने देखा। वह हीरे-मोतियों के आभूषणों से मंडित थी। उसकी अंगकांति से समग्र अंत‘पुर की शोभा विकीर्ण हो रही थी। वह सुवर्ण-सदृश गौरांगिनी थी। अंतःपुर की रमणियों की वह स्वामिनी थी। उसकी देहयष्टि, उसका रूप, यौवन, उसकी शरीर-कांति को देख कर हनुमान ने समझा स्यात् यही सीता है? किंतु वह सीता नहीं, रावण की पट्टमहिषी मंदोदरी थी। इससे लगता है कि आर्य और राक्षस स्त्रियों में कोई भेद नहीं था। रूप-सौंदर्य-समन्वित राक्षस कुलोद्भुत वह मंदोदरी उदात्त हृदयवाली भी थी। वह कहती है कि पतिव्रता नारियों के आंसू धरती पर यों ही विलीन नहीं होते।
    रावण क उदात्तता भी प्रशंसनीय है। अपनी अनुपस्थिति में मथुरा के राजा मधुदैत्य द्वारा अपनी चचेरी बहन कुंभीनसी के हरण किये जाने की घटना से रावण क्रोधितज होकर मधुदैत्य के वध के लिए विमान से मथुरा पहुंच जाता है, किंतु, वहां पहचुनें पर कंुभीनसी के आर्त विनय के सम्मुख द्रवित होकर उसे सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद देता है    ।
    आर्य संस्कृति में जैसी विकासमान स्थितियां एवं उदात्त भावनाएं हैं, राक्षस संस्क्ृति में भी वे उसी तरह से रही है। राक्षस संस्कृति को अनार्य संस्कृति कहकर अपने ही रक्त को दूषित कहना है। भारत की सामाजिक संस्कृति में जैसे अन्य संस्कृतियों का मेल-जोल है, राक्षस संस्कृति का भी स्थान निर्दिष्ट है।
    फिर, देव संस्कृति के संस्थापक राम को राक्षस संस्कृति से कोई दुराव नहीं था। राम ने लंका-विजय के उपरांत राक्षस संस्कृति में पालित विभीषण को ही लंका का अधिपति बनाया। राम को रावण के कुछ आंशिक आचरणों के प्रति आपत्ति रही थी, बस।

    मंडल लेखा कार्यालय, पूर्वोत्तर रेलवे, वाराणसी-2

सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (1501 से 1556) मध्यकाल के भारतीय सम्राट थे। वह अकेले ऐसे हिन्दु योद्धा थे, जो मध्यकाल में दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान हुए। उन्होंने उत्तर भारत में बंगाल से पंजाब तक, अफगान विद्रोहियों के खिलाफ 20 युद्ध तथा अकबर के मजबूत ठिकानें आगरा व दिल्ली में अक्टूबर 1553 से 1556 तक 2 युद्ध लड़े और सबमें विजय प्राप्त की। इस लगातार विजय के कारण उनको सम्राट की उपाधि से अलंकृत किया गया।
    उनका जन्म राजस्थान में जिला अलवर के मछेरी गांव के राय पूर्ण दास के यहाँ हुआ। जो पुरोहित का काम करते थे। राय पूर्ण दास 1516 में व्यापार करने के लिए मछेरी से रेवाडी आ गये। हेमू ने रेवाड़ी में ही हिन्दी, संस्कृत फारसी व अरबी में शिक्षा ग्रहण की। उनका पालन पोषण सांस्कृतिक व धार्मिक वातावरण में हुआ। उनका परिवार वल्लभी संप्रदाय का अनुयायी था।
    विलक्षण प्रतिभा का परिचय देते हुए हेमू ने शेरशाह सूरी की सेना को कई प्रकार के साजो सामान की आपूर्ति प्रारंभ की। शेरशाह सूरी ने बाबर के पुत्र हुमायूं को 1540 में हरा कर उसको भारत से भागने पर विवश कर दिया था। अफगान वंश में शेरशाह सूरी की मृत्यु के पश्चात् 1540 में उनका पुत्र इस्लाम शाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा। उस समय हेमू न केवल रसद का, बल्कि शोरे का एक बड़ा व्यापारी बन गया था। ये शोरा वह पूर्तगालियों से आयात करता था, जो तोप के बारूद में इस्तेमाल होता था। इस व्यापार के साथ-साथ हेमू ने रेवाड़ी में प्रमुख हथियार पीतल की तोप को बनाने के लिए पीतल की ढलाई का उद्योग प्रारंभ किया।
    इस्लाम शाह, जो उस समय उत्तर भारत का शासक था, ने हेमू की योग्यताओं को पहचान कर उसको सबसे बड़ा संगायी बाजार अर्थात बाजार अधीक्षक नियुक्त किया और बाजार अधीक्षक के साथ आंतरिक सुरक्षा का मुखिया अधिकारी भी नियुक्त किया। जो पद वजीर के बराबर होता था। इस्लाम शाह के बाद 1553 में उत्तर भारत में आदिलशाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा और उसने हेतू को अपना प्रधानमंत्री एवं सेनानायक नियुक्त किया। ताकि उत्तर भारत के अनेक प्रदेशों में हो रहे विद्रोह को समाप्त किया जा सके। इस काल में उत्तर व पूर्वी भारत में हेमू ने अफगान विद्रोहियों के और अकबर के विरूद्ध 22 युद्ध लडे और सबमें विजय प्राप्त की। उन्होंने अपने शौर्य, साहस व युद्ध कौशल्य के कारण हिन्दु व अफगान सेनाओं में अपने प्रति अत्यंत सम्मान का स्थान प्राप्त किया। दिसंबर 1555 में हुमायूं की मृत्यु के समय हेतू बंगाल में थे और उन्होंने वहां के शासक मोहम्मद शाह को हरा दिया था। हुमायूं की मृत्यु पर उन्होंने दिल्ली का शासन बनने का विचार किया और इस विचार से अपने अफगान व राजपूत सेनानायकों को अवगर कराया तथा बंगाल से दिल्ली की ओर कूच किया। मार्ग में बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के कुछ भाग पर विजय प्राप्त की। हेमू की अनुपस्थिति में हुमायूं आगरा पर अधिकार कर चुका था और उस समय अकबर वहां गद्दी पर था। अकबर की सेना का नेतृत्व सिंकदर खां उज्बैक ने किया। सिकंदर खां उज्बैक हेमू से हराकर भाग गया और आगरा, काल्पी व बयाना क्षेत्रों पर हेमू का अधिकार हो गया। तत्पश्चात् हेमू ने 7 अक्तूबर 1556 को दिल्ली की ओर कूच किया। मात्र एक दिन की लड़ाई के पश्चात अकबर के सेनापति तरदीबेग खान ने दिल्ली को छोड़ दिया। हेमू ने पूरे राजकीय ठाट-बाट के साथ दिल्ली में प्रवेश किया और वहां पुराना किला में अफगान व राजपूत सेनानायकों की उपस्थिति में धार्मिक विधि अनुसार उनका राज्य अभिषेक हुआ और उन्होंने शताब्दियों से विदेशी शासन की गुलामी से जकड़े भारत को मुक्त कराकर विक्रमादित्य वंश को पनः स्थापित किया। उन्होंने सिक्के ढलवाये और सेना का पुर्नगठन किया तथा बिना किसी अफगान सेनानायक को हटाये हिदु अधिकारियों को निुक्त किया।
    यह सब समाचार बैरम खां व अकबर, जो उस समय पंजाब मंे थे, के लिए चिंताजनक थे। उनके सेनानायकों ने उनको परामर्श दिया कि व हेमू की शक्ति का सामना नहीं कर सकते, इसलिए काबुल लौट जायें। परंतु बैरम खां ने एक मौका और लेने की जिद्द की और युद्ध की तैयारियां आरंभ हुई। 5 नवंबर 1556, को पानीपत के मैदान में युद्ध हुआ, जिसमें बैरम खां व अकबर ने भाग नहीं लिया और वे युद्ध क्षेत्र से 5 कोस अर्थात् 9 मील दूर रहें। हेमू ने स्वयं अपनी सेना का नेतृत्य किया। प्रारंभिक सफलताओं से ऐसा लग रहा था कि मुगल सेना भाग जायेगी कि अचानक दुर्भाग्यवश एक तीर हेमू की आंख में लगा। हेमू ने तीर निकाल दिया और लड़ना जारी रखा। परंतु धीरे-धीरे वह बेहोश हो गये और लड़ाई हार गये। उनको बेहोशों की हालत में बंदी बना लिया गया और बैरम खां के सामने पेश किया गया। अकबर ने बैरम खां के सुझाव पर गाजी बनने के लिए बेहोशी की हालम में ही हेमू का सिर काट दिया।
    हेमू का सिर अफगानों को दिखाने के लिए कि वो मर चुका है काबुल भेजा गया और उनका धड़ दिल्ली में पुराना किला के सामने लटका दिया गया, जहां उन्होंने अपना राज्य अभिषेक किया था। किसी अन्य शासक ने अपने विरोधी सजा के साथ इतना बर्बरता पूर्ण व्यवहार नहीं किया जैसा अबकर ने हेमू के साथ किया। इस प्रकार एक साधारण हिन्दु की गौरवपूर्ण जीवन यात्रा समाप्त हुई। जिसने अपनी योग्यता के आधार पर न केवल मुगल साम्राज्य को उखाड़ दिया, बल्कि वह सारे हिन्दु समाज के लिए एक उदाहरण बन गया कि किस प्रकार से जीवन में अपने परिश्रम, दूरदृष्टि व कौशल्य के आधार पर कठिन से कठिन लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
    हेमू की मृत्यु के पश्चात हेमू की वंश, समर्थकों एवम् संप्रदाय का दमन प्रारंभ हुआ। हजारों के सिर काट दिये गये और मृतकों की खोपडियों के मीनार बनाये गये। ये मीनार उनकी हत्याओं के 50-60 वर्ष बाद तक दिखाई देते रहे और एक विदेशी पर्यटक श्री पीटर मुण्डी जो अकबर के पुत्र जहांगीर के काल में भारत भ्रमण कर रहा था, ने अपने यात्रा संस्मरणों में उनका उल्लेख किया है। उन्होंने मीनारों केे छायाचित्र दिये हैं। इन मीनारों के चित्र दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में एवं हरियाणा के पानीपत के सेना संग्रहालय में आज भी उपलब्ध हैं। अकबर ने अपने राज्य का विस्तार व संगठन इन मीनारों की छाया में किया, जो क्रुरता व बर्बरता का भयावह चिह्न है।

सुधीर भार्गव
    लेखक हेमू विक्रमादित्य फाऊंडेशन, रेवाड़ी, भारत के अध्यक्ष हैं।
    (नवोत्थान लेख सेवा, हिन्दुस्थान समाचार)

अतीत के बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है जैसे लोग क्या खाते थे, कैसे कपडे पहनते थे, किस तरह के घरो में रहते थे? हम उस समय के कृषकों व्यापारियों, पुरोहितों, शिल्पकारों या फिर वैज्ञानिकों के जीवन के बारे में जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं। पुरातत्वविद्य पत्थर और ईंट से बनी इमारतों के अवशेषों चित्रों तथा मूर्तियों का अध्ययन करते हैं। वे औजारों हथियारों, बर्तनों, आभूषणों तथा सिक्को की प्राप्ति के लिए छान-बीन तथा खुदाई भी करते हैं।
    पुरातत्वविदों एवं इतिहासकारों के निर्णयों के अनुसार कृषि का आरंभ 8000 वर्ष पूर्व, सिंधु सभ्यता के प्रथम नगर का निर्माण 700 वर्ष पूर्व, गंगाघाटी के नगर, निर्माण मगध का बड़ा राज्य 2500 वर्ष पूर्व तथा वर्तमान लगभग 2000 वर्ष पूर्व आंका गया है। प्रमाण मिलते हैं, लोहे का प्रयोग आदिकाल से हो रहा है। उत्तर पाषाण काल में कब्रों में लोहे के औजार और अन्य वस्तुएं बडी संख्या में मिली हैं। पहले भी लोहे के औजारों के बढ़ते उपयोग का प्रमाण मिलत है। इनमें जंगलो को साफ करने के लिए कुल्हाडियाँ और जुताई के लिए हलो के फाल तथा फावड़े आदि सम्मिलित हैं। उस समय भी अधिकांश गांवो में लोहार, बढ़ई, कुम्हार तथा बुनकर जैसे कुछ शिल्पकार भी होते होंगे?
    लोहे का प्रयोग आज एक आम बात है। लोहे की चीजें हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा बन गई हैं। इतिहासकारों के अनुसार इस उपमहाद्वीप (भारत) में लोहे का प्रयोग लगभग 3000 वर्ष पूर्व शुरू हुआ। महापाषाण कब्रों में लोहे के औजार और हथियार बड़ी संख्या में मिले हैं। परन्तु इससे भी पूर्व महाभारत काल में धातुओं से बने हथियार तथा रथ और रामायण काल में धतु से बना पुष्पक विमान के निर्माण के प्रमाण हमारे साहित्य में उपलब्ध हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि इतिहास कारों की काल गणना तथा वैदिक साहित्य के उल्लेख आपस में कहीं भी मेल नहीं खाते हैं। यह अलग से शोध का विषय है। हडप्पा नगरों में ऐसे लोग रहते होंगे, जो नगर की खास इमारतें बनाने की योजना में जुटे रहते थे। ये सम्भवतः यहां के शासक थे। इसके अतिरिक्त नगरों में शिल्पकार स्त्री-पुरूष भी रहते थे, जो अपने घरों या किसी उद्योग-स्थल पर तरह-तरह की चीजें बनाते होंगे? इतिहासकारों के मतानुसार हड़प्पा के नगरों का विकास लगभग 2700 से 1900 ई. पूर्व के बीच में हुआ।
    लोग नगरों के अतिरिक्त गांवों में भी रहते थे। वे अनाज उगाते थे और जानवर पालते थे। जमीन की जुताई के लिए हल का प्रयोग एक नई बात थी। हल प्रायः लकड़ी से बनाए जाते थे, हल के आकार के खिलौने (खुदाई में) मिले हैं।
    युग (2500 वर्ष पूर्व) में कृषि के क्षेत्र में दो बड़े परिवर्तन आए। हल के फाल अब लोहे के बनने लगे। अब कठोर जमीन को लकड़ी के फाल की तुलना में लोहे के फाल से आसानी से जोता जा सकता था। इससे फसलों की उपज बढ़ गई। इसे उस समय की ‘‘हरित-क्रांति’’ कहा जा सकता है।
    शिल्पकारों की कुशलता के नमूने-स्तूपों जैसी कुछ इमारतों में देखने को मिलते हैं। स्तूप का अर्थ शाब्दिक टीला होता है। प्रायः सभी स्तूपों के भी तर एक छोटा सा डिब्बा रखा रहता है।
    इन डिब्बों में बुद्ध या उसके अनुयायीयों के शरीर के अवशेष या उनके द्वारा प्रयुक्त कोई चीज या कोई कीमती पत्थर अथवा सिक्के रखे रहते हैं। इसे धातु-मंजुषा कहते हैं। प्रांरभिक स्तूप, धातु-मंजुषा के उपर रखा मिट्टी काटीला होता था। बाद में टीले को ईंटो से ढक दिया गया और बाद काल में उस गुम्बदनुमा ढांचे को तराशे हुए पत्थरों से ढक दिया गया।
    महरौली (दिल्ली) में कुतुबमीनार के परिसर में खडा लौह स्तम्भ भारतीय शिल्पकारों की कुशलता का एक अद्भुत उदाहरण है। इससकी उंचाई 7.2 मीटर और वजर 3 टन से भी ज्यादा है। इसका निर्माण लगभग 1500 वर्ष पूर्व हुआ। इसके निर्माण काल की जानकारी इस पर खुदे ओम लेख से मिलती है। आश्चर्य की बात यह है कि इतने वर्षो के पश्चात तभी इसमें जंग नही लगी है।
    प्राचीन काल से ही पहाडियों को काटकर बनावटी गुफा है बनाई जाती थी। इस तरह की कई गुफाओं की मूर्तियों तथा चित्रोद्वारा सजाया जाता था। समय-समय पर हिन्दु मंदिरों का भी निर्माण किया गया। इस विषय पर अलग से विस्तार पूर्वक चर्चा की जा सकती है।

    रामशरण युयुत्सु

देखिये, पहले मेरे कुछ सवाल है आप सबसे
आरक्षण क्या है?
आरक्षण किसके लिए है?
आरक्षण का लाभ कौन ले रहा है?


मैं अपनी ही बात करूं तो मैं ब्राह्मण वर्ग से हुँ और जाहिर है मुझे आरक्षण नही मिला हुआ और ना ही मुझे आरक्षण से कोई मतलब। मेेरे पिता जी एक लोकल न्यूजपेपर में काम करते है।
बस बात ये है कि जातिगत आरक्षण के नाम पर हम सबसे ये भेदभाव क्यो?
मैं स्टूडेंट हूँ, और मेरे बहुत से दोस्त है जोकि आरक्षण की श्रेणी में आते है। कुछ के पिता अच्छी सरकारी नौकरी पर है, अच्छी कमाई करते है। और कुछ के पिता ना तो ज्यादा कमा ही पाते है और ना ही कोई फैमिली सपोर्ट इतना अच्छा है।
अब मान लीजिए की हम एक साथ पढते है एक स्कूल में, एक ही क्लास में।
मेरी फीस 1000रु ली जाती है जबकि मेरे दोस्त जो ओबीसी वर्ग से है उससे 500 लिये जाते है और जो एस सी वर्ग से है उससे सिर्फ 300 रु
अब फर्क देखने वाली बात ये है कि हम एक साथ खेले एक साथ बड़े हुए एक ही स्कुल एक ही क्लास फिर ये भेदभाव क्यों? 
और ये भेदभाव हमे किसने सिखाया? 
अब जरा आगे सुनिए।
मान लीजिए हम सरकारी नोकरी के लिये फार्म डालते है।
मै और मेरा दोस्त फार्म भरने गए उसी फार्म के मै 500 रूपये भरता हूँ और मेरा दोस्त जिसके पिताजी सरकारी नोकरी पर है वही फार्म वो 50 रूपये में भर देता है।
अब और आगे सुनिए।
हम दोनों ने एकसाथ जीतोड़ तैयारी की परीक्षा की और मै 80 नम्बर लाने के बावजूद मेरा चयन नही होता और मेरा दोस्त 60 नम्बर पाकर भी चयनित है।
यइ कैसा आरक्षण?
इसका मतलब प्रतिभाशाली युवक तो नोकरी पा ही नही सकता।
इतना ही नही अगर आप रेलवे में फार्म भरते हो और SC केटेगरी से हो तो आपकी परीक्षा जहाँ होगी वहा तक का रैलवे पास आपके घर पहुंच जायेगा वो अलग बात है की आपके पिताजी भी रेलवे मे है और आपके पास पहले से ही उनका पास है। और जिसको शायद उस पास की ज्यादा आवश्यकता है उसे वो नही मिल रहा।
इसे आपको पता चल ही गया होगा की आरक्षण का लाभ कैसे लोग ले रहे है।

क्या आपको नही लगता जी की आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए।
गरीबी जाति देखकर नही आती।
एक SC वर्ग के कमिश्नर का बेटा आरक्षण का लाभ ले रहा है।और एक रेडी लगाने वाले ब्राह्मण का बेटा आरक्षण का लाभ नही ले पा रहा।

आरक्षण संविधान की मूल भावना "समानता का अधिकार" का खुल्लम खुल्ला उलंघन है! अंधेर नगरी हे, क़ाबलियत को ताक पर रख इंसान की जाती देख कर नौकरी एवं पद्दौन्ति दी जाती हे| जातिगत आरक्षण एक सामाजिक अन्याय है और अन्याय के मार्ग से किस्सी का भी भला नहीं होता है ना देश का और ना हीं देश वासियों का| जातिगत आरक्षण की बजह से कुछ लोगो को पिछड़ी एवं अत्यंत पिछड़ी जाति में रख कर उनका अपमान किया जाता है तो कुछ लोगो की क़ाबलियत का अपमान किया जाता है यह अन्याय अधिक समय तक नहीं चलेगा. यह अन्याय तो समाप्त होकर रहेगा ,चाहे महाभारत ही क्यों न हो. न्याय और अन्याय की लड़ाई में विजय तोह न्याय पक्ष की ही होगी. इतिहास गवाह है जब जब पृथ्वी पर अन्याय बढ़ा तब तब सर्वनाश हुआ है. अन्याय करना और अन्याय सहना दोनों ही पाप है उठो और सब मिलकर इस अन्याय अंत करे.

जय तिवारी

रचनाकार-कवि गौरव चौहान इटावा

भारत की बर्बादी का वो खुलेआम आयोजन था,
जिसे कन्हैया समझे थे वो कलयुग का दुर्योधन था,

ये यूनीवर्सिटी ज़हर की खेती करने वाली है,
नौजवान पीढ़ी के मन में नफरत भरने वाली है,

यहाँ किताबों पर मदिरा के अर्घ चढ़ाये जाते हैं,
देश-धर्म से गद्दारी के पाठ पढ़ाये जाते हैं,

ब्रेनवाश की मुहिम छिड़ी है इस परिसर में सालों से,
प्रोफ़ेसर के पद भी देखो भरे पड़े चण्डालों से,

काश्मीर को आज़ादी दो,बोध कराया जाता है,
भारत के टुकड़े करने पर शोध कराया जाता है,

महिषासुर को दुर्गा वध के कोर्स कराये जाते हैं,
और कन्हैया चीर हरण में फेलोशिप ले आते है,

लाल जवाहर की छाती पर ये अफीम की फसलें हैं,
और कलंकित वामपंथ की ये नाजायज नस्लें हैं,

बोल कन्हैया तुझको कितनी और अधिक आज़ादी दें,
संविधान को आग लगा दें भारत को बर्बादी दें,

हवस भरे हाथों में आज़ादी को खूब उछाला है,
तुमने मिलकर आज़ादी का गैंगरेप कर डाला है,

आग लगे उस आज़ादी को,जो भारत से बैर करे,
नक्सलियों को नायक माने,आतंकी की खैर करे,

आग लगे उस आज़ादी में जो दुश्मन को ताली दे,
खुलेआम जो भी भारत की सेनाओं को गाली दे,

ये गौरव चौहान कहे अब धैर्य टूटने वाला है,
गद्दारी से भरा हुआ अब घड़ा फूटने वाला है,

जिस दिन सेना सनक गयी,हर भूत उतारा जाएगा,
तू भी शायद सेना के हाथों से मारा जाएगा,

भारत का कानून अगर गद्दारों को सहलायेगा,
भारत माँ का बच्चा बच्चा ऊधम सिंह बन जाएगा,

भारत माँ का और अधिक अपमान नही सह पाएगी,
अब सच्चा इंसाफ यहाँ पर भीड़ सुनाने आएगी,

वो कान्हा है या कासिम है,रहम नही दिखलाएगी,
जो भारत को गाली देगा भीड़ उसे खा जायेगी,